ईरान और अमेरिका के बीच जंग एक बार फिर पूरी तरह भड़क उठी है। अप्रैल 2026 में हुए संघर्ष विराम के टूटने के बाद अमेरिका लगातार सातवीं रात ईरान पर हमले कर चुका है, जबकि ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई में खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। इस बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ला दिया है, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, एलपीजी आपूर्ति और खाड़ी में रह रहे लाखों भारतीयों पर पड़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जिससे दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल व्यापार का आवागमन होता है, एक बार फिर संकट के केंद्र में आ गया है। ईरान की क्रांतिकारी गार्ड कोर (IRGC) ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी सेना इस जलमार्ग के प्रबंधन में हस्तक्षेप कर रही है, जिसके बाद तनाव और गहरा गया है। इस बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी हैं, जिससे भारत सहित दुनियाभर के तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ गई है।
ताजा हालात: फिर से पूरी तरह छिड़ी जंग
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने ईरान पर लगातार सातवीं रात हमले किए, जिसमें निगरानी ठिकानों, सैन्य रसद अवसंरचना, भूमिगत हथियार भंडार और समुद्री क्षमताओं को निशाना बनाया गया। जवाब में ईरान की क्रांतिकारी गार्ड कोर ने बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, जॉर्डन और सीरिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले की जिम्मेदारी ली है।
ईरानी मीडिया के मुताबिक, दक्षिणी ईरान के कई पुल और अहवाज़ शहर के एक अस्पताल के पास हुए हमलों के बाद अस्पताल को खाली कराना पड़ा। ईरान ने संयुक्त राष्ट्र से भी शिकायत करते हुए कहा है कि अमेरिका के लगातार हमले अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए “तात्कालिक खतरा” बन गए हैं।
यह संघर्ष कोई नया नहीं है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर संयुक्त हमले शुरू किए थे, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई भी मारे गए थे। इसके बाद अप्रैल में पाकिस्तान की मध्यस्थता से दोनों पक्षों के बीच अस्थायी संघर्ष विराम हुआ था, जो जुलाई के मध्य में पूरी तरह टूट गया।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, और एलपीजी के लिए भी खाड़ी देशों पर 90 प्रतिशत से ज्यादा निर्भरता है। ऐसे में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह की लंबी रुकावट सीधे तौर पर घरेलू ईंधन कीमतों, महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा कि सरकार भविष्य में किसी भी तरह की कीमत में उछाल से निपटने के लिए रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने और आपूर्ति साझेदारियों को मजबूत करने पर काम कर रही है। इससे पहले मार्च में हुए संकट के दौरान एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखी गई थी, और सरकार को पेट्रोकेमिकल उत्पादन से हटकर रसोई गैस आपूर्ति को प्राथमिकता देनी पड़ी थी।
इसके अलावा खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं, जो हर साल भारत को 40 अरब डॉलर से ज्यादा की विदेशी मुद्रा भेजते हैं। खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह की आर्थिक सुस्ती का सीधा असर भारत के कई राज्यों के परिवारों की आय पर पड़ सकता है। बासमती चावल और फलों के निर्यात-आयात व्यापार पर भी युद्ध का असर पहले ही देखा जा चुका है, क्योंकि बीमा कंपनियां युद्धग्रस्त क्षेत्र की ओर जाने वाले जहाजों का बीमा करने से हिचक रही हैं।
कूटनीतिक स्थिति और आगे की राह
अप्रैल में हुए संघर्ष विराम के तहत दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई स्थायी रूप से समाप्त करने पर सहमति जताई थी, और जून 2026 में एक 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी हुए थे। लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में यह संघर्ष विराम टूट गया, जिसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हमले फिर शुरू कर दिए।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि इस क्षेत्र में इजराइल के प्रभाव को लेकर जल्द ही और बातें सामने आएंगी। वहीं अमेरिकी सेंट्रल कमांड का कहना है कि उसकी सेना नागरिक ठिकानों को निशाना नहीं बनाती, जबकि ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने रेलवे स्टेशन और नागरिक हवाई अड्डे पर भी हमला किया है।
फिलहाल किसी नई वार्ता की कोई ठोस तारीख सामने नहीं आई है, हालांकि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्यस्थता के प्रयास जारी बताए जा रहे हैं।
भारत सरकार की तैयारी
भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। तेल मंत्रालय ने आपूर्ति में किसी भी व्यवधान से निपटने के लिए वैकल्पिक स्रोतों और भंडारण क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है। इसके साथ ही खाड़ी देशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी विदेश मंत्रालय स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है।
निष्कर्ष
ईरान-अमेरिका युद्ध का दोबारा भड़कना सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि इसका असर सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और खाड़ी में बसे लाखों भारतीय परिवारों पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति और किसी भी नई कूटनीतिक पहल पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ईरान-अमेरिका युद्ध कब शुरू हुआ था?
यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमलों के साथ शुरू हुआ था।
क्या दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम हुआ था?
हां, अप्रैल 2026 में पाकिस्तान की मध्यस्थता से संघर्ष विराम हुआ था और जून में एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर हुए, लेकिन जुलाई में यह टूट गया।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इतना अहम क्यों है?
दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल व्यापार का आवागमन इसी जलमार्ग से होता है, इसलिए इसमें किसी भी रुकावट का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है।
इस युद्ध का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत की तेल और एलपीजी की भारी निर्भरता खाड़ी क्षेत्र पर है, इसलिए आपूर्ति में रुकावट से ईंधन कीमतें, महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
खाड़ी में रह रहे भारतीयों पर क्या प्रभाव है?
खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं जो हर साल भारी विदेशी मुद्रा भेजते हैं, और क्षेत्रीय अस्थिरता का असर उनकी आय और सुरक्षा दोनों पर पड़ सकता है।
भारत सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए क्या कर रही है?
सरकार रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाशने और खाड़ी में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा पर नजर रखने का काम कर रही है।
क्या तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं?
यह इस पर निर्भर करता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान कितने समय तक चलता है और क्या कोई नया कूटनीतिक समाधान निकलता है।